
चने की खेती भारतीय किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण आय का स्रोत है। लेकिन खरपतवार, रोग-कीट और पौधों की सही बढ़वार न होने के कारण पैदावार कम हो जाती है।
आज हम बात करेंगे एक नई और प्रभावी दवा के बारे में जो चने की फसल में पैदावार बढ़ाने में मदद करेगी।
दवाई का परिचय — ‘एबक्सीकोनाज़ोल + राइज़ोबैक्टीरिया’
हम बात कर रहे है एक संयोजन (Combination) फॉर्मूले के बारे में, जिसमें शामिल है:
एबक्सीकोनाज़ोल (Absciconazole) – एक सुगम कवकनाशी
राइज़ोबैक्टीरिया (Rhizobacteria) – मिट्टी में रहने वाले लाभकारी जीव
यह संयोजन चने के पौधों की जड़ों को मजबूत बनाता है,
रोग-कीट से सुरक्षा देता है और
पौधों की पोषक तत्व अवशोषण क्षमता बढ़ाता है।
यह दवाई कैसे काम करती है?
एबक्सीकोनाज़ोल:
यह पौधे में सीधा प्रवेश करता है और फंगल के रोगों से बचाता है।
इससे पौधे की वृद्धि अच्छी होती है और संसाधनों का सही उपयोग होता है।
राइज़ोबैक्टीरिया:
ये लाभकारी बैक्टीरिया मिट्टी में जाकर पौधों की जड़ों के आसपास रहते हैं और पौधे को पोषक तत्व आसानी से उपलब्ध कराते हैं।
इनकी वजह से पौधे अधिक मजबूत और स्वस्थ बनते हैं।
चने में उपयोग के प्रमुख फायदे
पौधे की जड़ों को मज़बूत बनाता है
रोग-कीटों के खिलाफ सुरक्षा
पौधों का पोषक तत्व अवशोषण बेहतर होता है
स्टेम और देरी से फूलने में सुधार
कुल मिलाकर पैदावार में वृद्धि
कब और कैसे उपयोग करें?
सबसे अच्छा समय:
चने की बुवाई के 2–3 हफ्ते बाद (जब पौधे 3–4 पत्तियाँ निकाल चुके हों)
खुराक:
5 मि.ली. दवा + 1 लीटर पानी
प्रति एकड़ स्प्रे के लिए 200–300 लीटर पानी का उपयोग करें
स्प्रे विधि:
सुबह या शाम को स्प्रे करें
तेज धूप या तेज हवा में न करें
खेत में मिट्टी थोड़ा नम हो तो परिणाम और बेहतर
स्प्रे की आसान विधि
- पंप स्प्रेयर में पानी भरें
- तय मात्र में औषधि मिलाएँ
- समान रूप से फसल में स्प्रे करें
- 7–10 दिन बाद आवश्यकता अनुसार दोबारा स्प्रे करा सकते हैं
सावधानियाँ
अनुशंसित मात्रा से अधिक उपयोग न करें
छिड़काव के समय दस्ताने और मास्क का उपयोग करें
बच्चों और पशुओं से दवा को दूर रखें
छिड़काव के बाद खेत में 24 घंटे कोई कार्य न करें
खेत की तैयारी और देखभाल सुझाव
बुवाई से पहले मिट्टी की जांच करवाएँ
बढ़वार के दौरान पर्याप्त पानी दें
खरपतवार नियंत्रण करे
पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग
निष्कर्ष
चने की खेती में एबक्सीकोनाज़ोल + राइज़ोबैक्टीरिया का उपयोग एक सरल, सुरक्षित और प्रभावी तरीका है जो पौधों को मजबूत बनाकर पैदावार बढ़ाने में मदद करता है।
अगर इसे सही समय और विधि से उपयोग किया जाए, तो किसान भाई ज़रूर बेहतर परिणाम पाते हैं।